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महाभारत 185.34

ततो मनुर्महाराज यथोक्तं मत्स्यकेन ह
बीजान्यादाय सर्वाणि सागरं पुप्लुवे तदा
नावा तु शुभया वीर महोर्मिणमरिंदम

पूरा अध्याय