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महाभारत 184.16

तार्क्ष्य उवाच
क्षेत्रज्ञभूतां परलोकभावे; कर्मोदये बुद्धिमतिप्रविष्टाम्
प्रज्ञां च देवीं सुभगे विमृश्य; पृच्छामि त्वां का ह्यसि चारुरूपे

पूरा अध्याय