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महाभारत 180.18

न ग्राम्यधर्मेषु रतिस्तवास्ति; कामान्न किंचित्कुरुषे नरेन्द्र
न चार्थलोभात्प्रजहासि धर्मं; तस्मात्स्वभावादसि धर्मराजः

पूरा अध्याय