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महाभारत 173.10

संवत्सरं तं तु विहृत्य गूढं; नराधमं तं सुखमुद्धरेम
निर्यात्य वैरं सफलं सपुष्पं; तस्मै नरेन्द्राधमपूरुषाय

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