ग्रंथमहाभारतवनपर्वअध्याय 165165.13महाभारत 165.13बबन्ध चैव मे मूर्ध्नि किरीटमिदमुत्तमम् स्वरूपसदृशं चैव प्रादादङ्गविभूषणम्पिछलाअगलापूरा अध्याय