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महाभारत 132.11

संपीड्यमाना तु तदा सुजाता; विवर्धमानेन सुतेन कुक्षौ
उवाच भर्तारमिदं रहोगता; प्रसाद्य हीनं वसुना धनार्थिनी

पूरा अध्याय