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महाभारत 5.114

वैशंपायन उवाच
एताः कुरूणामृषभो महात्मा; श्रुत्वा गिरो ब्राह्मणसत्तमस्य
प्रणम्य पादावभिवाद्य हृष्टो; राजाब्रवीन्नारदं देवरूपम्

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