ग्रंथमहाभारतआश्रमवासिकपर्वअध्याय 4747.8महाभारत 47.8गुरुशुश्रूषया चैव जननी तव पाण्डव प्राप्ता सुमहतीं सिद्धिमिति मे नात्र संशयःपिछलाअगलापूरा अध्याय