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महाभारत 32.11

इयं स्वसा राजचमूपतेस्तु; प्रवृद्धनीलोत्पलदामवर्णा
पस्पर्ध कृष्णेन नृपः सदा यो; वृकोदरस्यैष परिग्रहोऽग्र्यः

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