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महाभारत 25.17

त्वगस्थिभूतः परिशुष्कमांसो; जटाजिनी वल्कलसंवृताङ्गः
स पार्थिवस्तत्र तपश्चचार; महर्षिवत्तीव्रमपेतदोषः

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