ग्रंथमहाभारतआश्वमेधिकपर्वअध्याय 9595.20महाभारत 95.20नेदं शक्यं वृथा कर्तुं मम सत्रं कथंचन वर्षिष्यतीह वा देवो न वा देवो भविष्यतिपिछलाअगलापूरा अध्याय