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महाभारत 93.53

श्वशुर उवाच
अनेन नित्यं साध्वी त्वं शीलवृत्तेन शोभसे
या त्वं धर्मव्रतोपेता गुरुवृत्तिमवेक्षसे

पूरा अध्याय