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महाभारत 9.3

इन्द्र उवाच
कुतो दुःखं मानसं देहजं वा; पाण्डुर्विवर्णश्च कुतस्त्वमद्य
आचक्ष्व मे तद्द्विज यावदेता;न्निहन्मि सर्वांस्तव दुःखकर्तॄन्

पूरा अध्याय