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महाभारत 83.1

वैशंपायन उवाच
स तु वाजी समुद्रान्तां पर्येत्य पृथिवीमिमाम्
निवृत्तोऽभिमुखो राजन्येन नागाह्वयं पुरम्

पूरा अध्याय