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महाभारत 26.2

एको गुरुर्नास्ति ततो द्वितीयो; यो हृच्छयस्तमहमनुब्रवीमि
तेनानुशिष्टा गुरुणा सदैव; पराभूता दानवाः सर्व एव

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