ग्रंथमहाभारतआश्वमेधिकपर्वअध्याय 2626.15महाभारत 26.15कामचारी तु कामेन य इन्द्रियसुखे रतः व्रतचारी सदैवैष य इन्द्रियजये रतःपिछलाअगलापूरा अध्याय