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महाभारत 57.31

स्वकर्मभिर्मानवं संनिबद्धं; तीव्रान्धकारे नरके पतन्तम्
महार्णवे नौरिव वायुयुक्ता; दानं गवां तारयते परत्र

पूरा अध्याय