ग्रंथमहाभारतअनुशासनपर्वअध्याय 5555.2महाभारत 55.2कुशिक उवाच यदि प्रीतोऽसि भगवंस्ततो मे वद भार्गव कारणं श्रोतुमिच्छामि मद्गृहे वासकारितम्पिछलाअगलापूरा अध्याय