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महाभारत 51.4

नहुष उवाच
करवाणि प्रियं किं ते तन्मे व्याख्यातुमर्हसि
सर्वं कर्तास्मि भगवन्यद्यपि स्यात्सुदुष्करम्

पूरा अध्याय