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महाभारत 105.59

गौतम उवाच
शिवं सदैवेह सुरेन्द्र तुभ्यं; ध्यायामि पूजां च सदा प्रयुञ्जे
ममापि त्वं शक्र शिवं ददस्व; त्वया दत्तं प्रतिगृह्णामि नागम्

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