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महाभारत 86.7

चतुरो ब्राह्मणान्वैद्यान्प्रगल्भान्सात्त्विकाञ्शुचीन्
त्रींश्च शूद्रान्विनीतांश्च शुचीन्कर्मणि पूर्वके

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