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महाभारत 65.4

बहुश्रुत्या गुरुशुश्रूषया वा; परस्य वा संहननाद्वदन्ति
नित्यं धर्मं क्षत्रियो ब्रह्मचारी; चरेदेको ह्याश्रमं धर्मकामः

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