महाभारत 64.16
नासौ देवो विश्वरूपो मयापि; शक्यो द्रष्टुं ब्रह्मणा वापि साक्षात्
येऽन्ये कामास्तव राजन्हृदिस्था; दास्यामि तांस्त्वं हि मर्त्येषु राजा
नासौ देवो विश्वरूपो मयापि; शक्यो द्रष्टुं ब्रह्मणा वापि साक्षात्
येऽन्ये कामास्तव राजन्हृदिस्था; दास्यामि तांस्त्वं हि मर्त्येषु राजा