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महाभारत 296.39

अवाप्तमेतद्धि पुरा सनातना;द्धिरण्यगर्भाद्गदतो नराधिप
प्रसाद्य यत्नेन तमुग्रतेजसं; सनातनं ब्रह्म यथाद्य वै त्वया

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