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महाभारत 235.27

अतः परं परममुदारमाश्रमं; तृतीयमाहुस्त्यजतां कलेवरम्
वनौकसां गृहपतिनामनुत्तमं; शृणुष्वैतत्क्लिष्टशरीरकारिणाम्

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