Utshovऐप डाउनलोड करें

महाभारत 215.34

प्रह्राद उवाच
आर्जवेनाप्रमादेन प्रसादेनात्मवत्तया
वृद्धशुश्रूषया शक्र पुरुषो लभते महत्

पूरा अध्याय