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महाभारत 211.47

भूव्योमतोयानलवायवो हि; सदा शरीरं परिपालयन्ति
इतीदमालक्ष्य कुतो रतिर्भवे;द्विनाशिनो ह्यस्य न शर्म विद्यते

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