ग्रंथमहाभारतशान्तिपर्वअध्याय 172172.8महाभारत 172.8का नु प्रज्ञा श्रुतं वा किं वृत्तिर्वा का नु ते मुने क्षिप्रमाचक्ष्व मे ब्रह्मञ्श्रेयो यदिह मन्यसेपिछलाअगलापूरा अध्याय