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महाभारत 172.33

अभिगतमसुखार्थमीहनार्थै;रुपगतबुद्धिरवेक्ष्य चात्मसंस्थः
तृषितमनियतं मनो नियन्तुं; व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि

पूरा अध्याय