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महाभारत 115.7

यद्यद्ब्रूयादल्पमतिस्तत्तदस्य सहेत्सदा
प्राकृतो हि प्रशंसन्वा निन्दन्वा किं करिष्यति
वने काक इवाबुद्धिर्वाशमानो निरर्थकम्

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