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महाभारत 110.1

युधिष्ठिर उवाच
कथं धर्मे स्थातुमिच्छन्नरो वर्तेत भारत
विद्वञ्जिज्ञासमानाय प्रब्रूहि भरतर्षभ

पूरा अध्याय