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महाभारत 25.34

वैशंपायन उवाच
इत्युक्त्वा न्यपतद्भूमौ गान्धारी शोककर्शिता
दुःखोपहतविज्ञाना धैर्यमुत्सृज्य भारत

पूरा अध्याय