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महाभारत 9.6

देवदूत उवाच
अभिधत्से ह यद्वाचा रुरो दुःखेन तन्मृषा
न तु मर्त्यस्य धर्मात्मन्नायुरस्ति गतायुषः

पूरा अध्याय