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महाभारत 87.15

प्रतर्दन उवाच
तांस्ते ददामि मा प्रपत प्रपातं; ये मे लोकास्तव ते वै भवन्तु
यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिता;स्तानाक्रम क्षिप्रमपेतमोहः

पूरा अध्याय