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महाभारत 86.7

दशैव पूर्वान्दश चापरांस्तु; ज्ञातीन्सहात्मानमथैकविंशम्
अरण्यवासी सुकृते दधाति; विमुच्यारण्ये स्वशरीरधातून्

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