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महाभारत 78.37

ययातिरुवाच
अतृप्तो यौवनस्याहं देवयान्यां भृगूद्वह
प्रसादं कुरु मे ब्रह्मञ्जरेयं मा विशेत माम्

पूरा अध्याय