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महाभारत 32.20

शेष उवाच
यथाह देवो वरदः प्रजापति;र्महीपतिर्भूतपतिर्जगत्पतिः
तथा महीं धारयितास्मि निश्चलां; प्रयच्छ तां मे शिरसि प्रजापते

पूरा अध्याय