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महाभारत 3.50

स तथेति प्रतिज्ञाय निराहारस्ता गा अरक्षत्
तथा प्रतिषिद्धो भैक्षं नाश्नाति न चान्यच्चरति
पयो न पिबति
फेनं नोपयुङ्क्ते

पूरा अध्याय