श्रीमद्भगवद्गीता 7.5
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्।।7.5।।
सरल अर्थ, AI द्वारा लिखा गयायह प्रकृति वह है जो तुम्हें ज्ञात है; परन्तु मेरी परा प्रकृति उससे अलग है, जो जीवों को धारण करती है और जगत को बनाये रखती है।