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श्रीमद्भगवद्गीता 5.9

प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्।।5.9।।

सरल अर्थ, AI द्वारा लिखा गयाबोलते, त्यागते, ग्रहण करते, आँखें खोलते या बंद करते हुए भी वह यही धारण करता है कि इंद्रियाँ अपने विषयों में बरत रही हैं।

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