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अथर्ववेद 42.1

सोमा॑रुद्रा॒ वि वृ॑हतं॒ विषू॑ची॒ममी॑ वा॒ या नो॒ गय॑मावि॒वेश॑ ।
बाधे॑थां दू॒रं निरृ॑तिं परा॒चैः कृ॒तं चि॒देनः॒ प्र मु॑मुक्तम॒स्मत् ॥१॥

पूरा अध्याय