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अथर्ववेद 9.2

मम॑ त्वा दोषणि॒श्रिषं॑ कृ॒णोमि॑ हृदय॒श्रिष॑म्।
यथा॒ मम॒ क्रता॒वसो॒ मम॑ चि॒त्तमु॒पाय॑सि ॥२॥

पूरा अध्याय