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अथर्ववेद 67.3

ऐषु॑ नह्य॒ वृषा॒जिनं॑ हरि॒णस्या॒ भियं॑ कृधि ।
परा॑ङ॒मित्र॒ एष॑त्व॒र्वाची॒ गौरुपे॑षतु ॥३॥

पूरा अध्याय