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अथर्ववेद 45.1

प॒रोऽपे॑हि मनस्पाप॒ किमश॑स्तानि शंससि ।
परे॑हि॒ न त्वा॑ कामये वृ॒क्षां वना॑नि॒ सं च॑र गृ॒हेषु॑ गोषु॑ मे॒ मनः॑ ॥१॥

पूरा अध्याय