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अथर्ववेद 4.3

धि॒ये सम॑श्विना॒ प्राव॑तं न उरु॒ष्या ण॑ उरुज्म॒न्नप्र॑युछन्।
द्यौ॒३ष्पित॑र्या॒वय॑ दु॒च्छुना॒ या ॥३॥

पूरा अध्याय