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अथर्ववेद 105.1

यथा॒ मनो॑ मनस्के॒तः॑ प॑रा॒पत॑त्याशु॒मत्।
ए॒वा त्वं कासे॒ प्र प॑त॒ मन॒सोऽनु॑ प्रवा॒य्यऽम् ॥१॥

पूरा अध्याय