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अथर्ववेद 98.3

कदू॒ न्व॑१स्याकृ॑त॒मिन्द्र॑स्यास्ति॒ पौंस्य॑म्।
केनो॒ नु कं॒ श्रोम॑तेन॒ न शु॑श्रुवे ज॒नुषः॒ परि॑ वृत्र॒हा ॥३॥

पूरा अध्याय