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अथर्ववेद 95.2

प्रो ष्व॑स्मै पुरोर॒थमिन्द्रा॑य शू॒षम॑र्चत ।
अ॒भीके॑ चिदु लोक॒कृत् सं॒गे स॒मत्सु॑ वृत्र॒हास्माकं॑ बोधि चोदि॒ता
नभ॑न्तामन्य॒केषां॑ ज्या॒का अधि॒ धन्व॑सु ॥२॥

पूरा अध्याय