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अथर्ववेद 54.1

विश्वाः॒ पृत॑ना अभि॒भूत॑रं॒ नरं॑ स॒जूस्त॑तक्षु॒रिन्द्रं॑ जज॒नुश्च॑ रा॒जसे॑ ।
क्रत्वा॒ वरि॑ष्ठं॒ वर॑ आ॒मुरि॑मु॒तोग्रमोजि॑ष्ठं त॒वसं॑ तर॒स्विन॑म् ॥१॥

पूरा अध्याय