ग्रंथअथर्ववेदकाण्ड 20सूक्त 4343.1अथर्ववेद 43.1भि॒न्धि विश्वा॒ अप॒ द्विषः॒ परि॒ बाधो॑ ज॒ही मृधः॑ । वसु॑ स्पा॒र्हं तदा भ॑र ॥१॥अगलापूरा अध्याय